Friday, 20 February 2015

  आज़ाद-ऐ-हिन्दोस्तां  का  महानायक 'नेताजी सुभाष चन्द्र बोस'

 अपने महामहिम को बता दो.... मैंने सारा जीवन राजनीति मे बिताया है... मुझे किसी के सलाह की जरूरत नहीं है।

     
दुभाषिये 'एडम वान ट्राट' से उन्होने सख्ती से कहा कि "ये अनुवाद हिटलर को सुना दे...",,,,जो उनके और हिटलर के बीच दुभाषिए का काम कर रहा था। एडम हक्का-बक्का रह गया कि हिटलर के सामने बैठ कर कोई उनसे इस लहजे मे भी बात कर सकता है।ये बात उस सुझाव का जवाब था जो हिटलर ने उनको दिया था ;- " भारत के स्वाधीनता संघर्ष के लिए ये उपयुक्त समय नहीं है।

 ये महमानव कोई और बल्कि भारतीय इतिहास के सबसे बड़े महानायक सुभाष चन्द्र बोस थे। वरना और किसकी माँ ने सवा सेर सोंठ खायी थी जो उस वक़्त के सबसे बड़े तानाशाह हिटलर से इस लहजे मे बात कर सके ।

 एक महानायक,,,जिनको कुछ लोगो के छुद्र स्वार्थो के चलते " शहीद " बनना पड़ा..... नेताजी,,की 18 अगस्त 1945 मे विमान दुर्घटना मे हुयी मृत्यु गलत साबित हो चुकी थी। ब्रिटेन ही नहीं अमेरिका तक उनको अपना दुश्मन नंबर एक समझता था....और इसी दुश्मनी का फायदा उठाया एक नंबर के मौकापरस्त कथित महान "चच्चा जवाहर लाल नेहरू" ने.... "नेताजी को युद्ध अपराधी घोषित करके ।  "


जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की गुमशुदगी से जुड़ी कोई भी ख़बर कहीं भी पढ़ने या देखने को नहीं मिलती थी ... और अगर हम कुछ चुनिन्दा लोगो को छोड़ दें तो किसी को इस बात की कोई परवाह भी नहीं थी कि भारत की आज़ादी के इस महानायक के साथ आखिर हुआ क्या था और उस के लिए कौन जिम्मेदार था ... नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करवाने की मांग तो भला करता ही कौन !?


 पिछले दिनों जब नेताजी से जुड़ी २ फाइलें सार्वजनिक की गई तो जैसे हड़कंप सा आ गया जबकि उन फाइलों मे केवल इतना ही छिपा था कि दो दशकों से ज्यादा समय तक नेताजी के परिवार और उनके परिजनों पर गुप्तचर एजेंसियाँ द्वारा जासूसी कारवाई गई और ऐसा तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कहने पर किया गया |


 RTI के माध्यम से और बाकी सूत्रों से काफी जांच पड़ताल के बाद अनुज धर जी ने इस जटिल गुत्थी को सुलझाने में एक दशक से ज़्यादा समय लगा दिया कि आखिर नेताजी बोस के साथ हुआ क्या !?


दशको से भारतवासी जानना चाहते हैं कि आखिर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को क्या हुआ। क्या नेताजी एक विमान दुर्घटना में मारे गऐ थे, या रूस में उनका अंत हुआ या फिर सन् 1985 तक वह, गुपचुप गुमनामी बाबा बनकर उत्तर प्रदेश रहे।

                                                                                                      - अभिषेक  दूबे ,
             ( गोरखपुर )